गाय पर निबंध


गाय एक पालतू प्राणी है। गाय के चार पैर होते हैं। गाय भूरी, सफेद, चितकबरे रंगों में पाई जाती है। गाय का दूध शरीर के लिए लाभदायक होता है। गाय के दो कान और एक पूँछ होती है। पढ़ने लिखने में बहुत होशियार नही थे, इसलिए ढंग से याद नही लेकिन कुछ इस तरह का निबंध गाय के ऊपर पढ़ा और लिखा था।

जनसंख्या विस्फोट के साथ दूध की मांग बढ़ी तो लोगों ने गाय को छोड़कर भैंस पालना शुरु कर दिया। गाय कम दूध देती है लेकिन लात बहुत मारती है। हमारे गांव के तेवारी तो रात के दो बजे गाय के खूंटा तोड़ाकर भागने पर उसे ढूंढने निकल जाते थे लेकिन गाय मिलने पर भी उसे मारते नही थे क्योंकि गाय पूजनीय है।

हिंदू परंपरा में अकसर सभी कृत्यों के पीछे कोई ना कोई वैज्ञानिक कारण होता है। शायद प्राचीन काल में कोई अपनी गाय को बहुत मारता रहा होगा तो किसी ने उस गाय पर दया खाकर उसे पूजनीय बना दिया। समय के साथ कर्मकांड बदले और फिर लोगों ने गाय के मांस को खाना शुरु कर दिया।

समय के साथ गाय पर निबंध भी बदल गया। गाय पर हाल ही में लिखा गया निबंध कुछ इस प्रकार है,"गाय एक सस्ता मांसाहार है। दाल और सब्जियों की बढ़ती किमत को देखते हुए गाय के मांस का सेवन आप की औकात में है और उससे सभी तरह के प्रोटीन मिलते हैं। गाय एक सांप्रदायिक प्राणी है इसका उपयोग नेता अपनी अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने में करते हैं। गाय अब भगवा और हरे रंग में पाई जाती है।"

गाय के बच्चे जो पहले बैल और सांड़ के नाम से जाने जाते थे वो अब हिन्दू और मुसलमान के नाम से जाने जाते हैं। देखने वाली बात ये है कि कही पर हिंदू बैल बना हुआ है तो कही पर मुसलमान बैल बना हुआ है और सांड़ बनने का चक्र भी इसी क्रम में चालू हैं। भगवान श्री कृष्ण जिन गायों को चराते थे उन गायों को आज देश चराने वाले नेता चरा रहें हैं। किसने सोचा था की एक दिन देश चराना और गाय चराना एक सा होगा।

गाय के अब भी चार पैर होते हैं परंतु उसके साईज की चप्पल ना मिलने कारण अब उनके पैर विलुप्ती के कगार पर हैं और धीरे धीरे गाय जमीन पर रेंगने लगेगी, ठीक उसी तरह जिस तरह हमारा लोकतंत्र बिगत कई वर्षों से रेंग रहा है।

डिसक्लेमर:इस खबर में कोई सच्चाई नहीं है। यह मजाक है और किसी को आहत करना इसका मकसद नहीं है।

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